महाराज 1008 श्री श्री कमलनानंद गिरीजी का महाप्रयाण — अरावली पर्वत पर स्थित श्री सांडेश्वर महादेव लालपुरा मंदिर में सालों तक जगाई थी भक्ति की ज्योत, श्री शिव शक्ति मठ लेवडा में हुए बहृम लीन

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-शनिवार को निकलेगी हरि हर मिलन यात्रा,आश्रम पर ही समाधि समारोह होगा

नीमच। जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर  ग्राम लेवडा स्थित श्री शिव शक्ति मठ के महंत 1008 श्री श्री कमलनानंद गिरीजी महाराज का शुक्रवार सुबह महाप्रयाण हो गया है। महाराज कमलनानंदगिरीजी 87 वर्ष के थे। वे कुछ दिनों से अस्वस्थ्य चल रहे थे। महज 15 वर्ष की आयु में ही वे वैराग्य के पथ पर निकल पडे थे। शनिवार को उनकी  हरि हर मिलन यात्रा लेवडा में निकलेगी और  सुबह 9 बजे पार्थिव शरीर की समाधि होगी। उनके देवलोकगमन से संत जगत में अपूरणीय क्षति हुई है।

संत 1008 श्रीश्री कमलनानंदजी गिरी महाराज की जन्म् स्थली छपरा बिहार है। वे बचपन में गृह जीवन त्याग कर संतमार्ग पर चल निकले। भारत भ्रमण के दौरान विद्वानों, ऋणियों, संतो से समागम हुआ। उनका गुरूस्थान अयोध्या रहा है। उन्होंने अयोध्यादास गिरीजी महाराज से दीक्षा ग्रहण की। उस वक्त उनकी आयु 20 वर्ष थी। इसके बाद उन्होंने माउंट टापू, पुष्कर भरूच गुजरात में महायज्ञ में साधनाएं की। जावद के समीप अरावली पर्वत पर स्थित सांडिल मुनी की तपस्थली श्री सांडेश्वर महादेव मंदिर पर वर्ष 1980 में आए, यहां पर साधनाएं लीन रहे। यहां पर इस बीच कई धार्मिक आयोजन करवाएं। वे आध्यात्म के जरिए भक्तों के सांसारिक कष्टों को दूर करते थे। महाराज 1008 श्री श्री कमलनानंदगिरीजी करीब  15 वर्षों से लेवडा स्थित श्री शिव शक्ति पीठ पर धर्म के पथ पर भक्ति की ज्योत जला रहे थे। भागवत कथा, भजन कीर्तन, यज्ञ, प्रतिष्ठान, संत चंडी, शहस्त्र चंडी, महारूद्र सहित कई धाार्मिक गतिविधियों को आश्रम पर ही संचालित कर रहे थे। लेवडा स्थित आश्रम् पर भक्तों का समागम तो लगता ही साथ ही दूर—दूर से संत महात्मा भी धार्मिक कार्यक्रमों में आते रहते थे।

याद रहेंगे गुरूजी— नीमच से लेकर जावद क्षेत्र में गुरूजी के नाम से प्रसिद्ध थे महाराज—
— मूल रूप से महाराज बिहार के रहने वाले थे, लेकिन बचपन में ही भक्ति के मार्ग पर निकल गए तो  पीछे मुडकर कभी देखा नहीं। नीमच जिले में वे जब से आए, तब से अपने बनकर रह गए। श्री सांडेश्वर महादेव मंदिर पर सालों से सेवा देने के बाद वे लेवडा स्थित श्री शिव शक्ति मठ पर आध्यात्म और भक्ति में लीन रहे। नीमच जिले में उनके नाम से नहीं बल्कि् गुरूजी के नाम से जाना जाता था, गुरूजी के नाम से ही उन्हें संबोधित करते है। वे अंचल वासियों के दिलों में बस गए थे, जब भी कोई धार्मिक कार्यक्रम आश्रम में होते थे तो सैकडों ग्रामीण उमडते थे और गुरूजी से आशीर्वाद लेते थे। गुरूजी भले ही दुनिया में नहीं रहे, लेकिन वे दिलो में हमेशा जिंदा रहेंगे।

सिंहस्थ 2016 में ली थी पंच दीक्षा—
— सालों से चलते आ रहे संत जीवन पर महाराज श्री कमलानंदगिरीजी ने उज्जैन सिंहस्थ 2016 में महानसंतों के सानिध्य में पंच दीक्षा ली और वे सिंहस्थ में कई संतो के साथ रहे। उन्होंने सिंहस्थ में भक्ति के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।

शंकराचार्य ज्ञानानंदजी ने श्रद्दासुमन अर्पित किए—
ज्योर्तिमठ आवांतर  भानपुरा पीठ के जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी श्री ज्ञानानंदजी तीर्थ महाराज ने श्रद्दासुमन अर्पित करते हुए कहा स्वामी कमलनानंद गिरीजी महाराज के ब्रहृमलीन होने से क्षेत्र की आध्यात्मिक क्षति हुई है,किन्तु उनका सूक्ष्म शरीर सदैव भक्तों को आलोकित करता रहेगा। स्वामी गिरीजी महाराज तत्व  दृश्यीय तो थे ही व्यवहारिक संत थे, आम लोगों से उनका जीवंत संपर्क था।

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